नशा चढ़ा है तुझे पाने का

नशा चढ़ा है तुझे पाने का आगोश में ले कर खो जाने का दिन हो या हो रात अंधेरी शाम ढले़ या हो सुबह सुनहरी बस यहाँ तो चाह है तेरी जो है सभी ओर से मुझ को घेरी कौन दिखाए तुझे पाने का द्वार करूँ आत्ममंथन या है कोई अन्य विचार अहसास दिला दूँ … Continue reading नशा चढ़ा है तुझे पाने का

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भगवान की माया

भगवान कैसी है तेरी लीला घुम नहीं पाए दुर्गा पुजा का मेला दिन भर रहता हूँ परेशान पूरे नहीं हो रहे दो-चार अरमान जिंदगी बन गई है सजा मिलता नहीं अमावट का मजा लगती है छिड़ी है कोई जंग है ही नहीं कोई अपने संग आस-पास है सिर्फ सन्नाटा कढौती में पानी से कम है … Continue reading भगवान की माया

गरीबी में समाज

कुमार आज सोचने है बैठा आखिर ये कैसा मेरा समाज है इस समाज में गरीबी है या गरीबी में समाज है! आजादी के इतने वर्ष बाद भी क्यूँ फैला ये अंधकार है कुछ को खाने भर अन्न नहीं है और कुछ को दौलत पे अपने नाज है क्यूँ इस लम्बें से वृतांत का सिर्फ गरीबी … Continue reading गरीबी में समाज

कलम से मोहब्बत

खामोशी में ही जी लेने दे एहसास अनुठी कर लेने दे ख्वाबों को कोई रूप सा ले लेने दे आसमां को कागज में खो जाने दे तुझसे मुझकों लिख लेने दे कोरे कागज को भर जानेे दे खामोशी में ही जी लेने दे एहसास अनुठी कर लेने दे हर दिन हर पल हर लम्हें में … Continue reading कलम से मोहब्बत

प्रयास ही प्रयास

क्या कहूँ मैं , क्या सुनूँ मैं वक्त चलता जा रहा है और चंद लम्हें ही बचे! करता हूँ सबसे एक निवेदन आज कह दे वो सब , जो बरसों से तेरे मन में है सुन रहा हर कोई , यहाँ संयम और सम्मान से सज गया है ये जहाँ , खुशियों के अरमान से … Continue reading प्रयास ही प्रयास

लुप्त इंसानियत

आज सड़क पर देखा एक दुबला - पतला , कमजोर-सा अपंग था कैसा उसका पहनावा छी कैसा उसका ढंग था और ऊपर से काला उसका रंग था लगता है बरसों से नहाया नहीं था कई दिनों से वो कुछ खाया नहीं था आज सड़क पर देखा एक दुबला - पतला , कमजोर-सा अपंग था वो … Continue reading लुप्त इंसानियत

भ्रूण हत्या

भ्रूण हत्या करके भी तुम कैसे जिंदा रह जाते हो? ऐसी निम्न हरकते करते हो तुम फिर समाज में घुल-मिल जाते हो आखिर कैसे अब भी तुम खुद को इंसान कह पाते हो! भ्रूण हत्या करके भी तुम कैसे जिंदा रह जाते हो? शादी करने के वक्त तो तुम लड़की लड़की चिल्लाते हो और जब … Continue reading भ्रूण हत्या

हताशा का दौर

बनायी थी जो ख्वाबों में इमारत देखा है उसे आँखों में ढहते हुए ! उठता है एक चक्रवात समुंद्र में हकीकत का कहर लाने को ! सब शीशे टुटने पे हैं उम्मीदों की दीवारें के ! रोशनी आती नहीं अब हर झरोखे पर कपड़ा है ! खेलने को कुछ नहीं मिलता अब खिलौना खुद ही … Continue reading हताशा का दौर

जिंदगी की मजदूरी

सुबह सवेरे ही निकल पड़ता हूँ हर रोज, एक सपना लेकर संग में रहते हैं मेरे आदर्श कर्त्तव्यनिष्ठा पर बल देते हुए शान बढ़ाने की ललक भी है और त्याग करने का साहस भी खुशियाँ निःसंदेह अच्छी लगती है पर गम भी अक्सर सोख लेता हूँ सुबह सवेरे ही निकल पड़ता हूँ हर रोज, एक … Continue reading जिंदगी की मजदूरी

भँवर

किस जगह हूँ मैं फँसा ? क्या भँवर है ये कोई ? ना आगे जा पा रहा ना पीछे मैं जा सकूँ गोल-गोल भूमता हूँ क्या केंद्र में हूँ मैं खड़ा ? किस जगह हूँ मैं फँसा? क्या भँवर है ये कोई ? समझ तो है काफी मुझमें तो गलतियाँ क्यूँ हो रही रूक गया … Continue reading भँवर